हम भारतीय खुद को दुनिया का सबसे धार्मिक समुदाय मानते हैं। हम गर्व से कहते हैं कि हमारी नदियाँ माँ हैं, हमारे पहाड़ देवता हैं, और हमारा हर कंकड़ शंकर है। लेकिन जरा ठहरिए और अपने आस-पास नजर घुमाइए। क्या जिस देश में नदियाँ पूजी जाती हैं, वहीं नदियाँ सबसे गंदी नहीं हैं? क्या जिस देश में गाय को माँ कहा जाता है, वहीं गाय कचरे के ढेर में प्लास्टिक खाती हुई नहीं मिलती?
आज हम बात करेंगे उस कड़वी सच्चाई की जो हमारे तथाकथित "धर्म" के पीछे छिपी है। हम बात करेंगे लोकधर्म की—यानी वह धर्म जो सिर्फ और सिर्फ स्वार्थ की पूजा करता है।
मंदिर मेरा साफ़, दुनिया जाए भाड़ में
लोकधर्म का सीधा सा उसूल है: "मेरा उद्धार हो जाए, बाकी दुनिया जले तो जले।"
हमारा धर्म हमारे घर की चारदीवारी के भीतर सिमट कर रह गया है। मेरे घर का मंदिर चमचमाता हुआ मिलेगा, उसमें एक भी धूल का कण नहीं होगा। क्यों? क्योंकि वहां मेरी मनोकामना पूरी होनी है। वहां मुझे अपने लिए सुख, समृद्धि और स्वर्ग मांगना है।
लेकिन जैसे ही आप घर से बाहर कदम रखते हैं, आपको क्या दिखता है? गंदगी, कूड़ा, और बदबू। जिस गली में हम रहते हैं, उसे गंदा करने में हमें एक पल की भी झिझक नहीं होती। हम चिप्स खाते हैं और पैकेट वहीं सड़क पर फेंक देते हैं। हम कार की खिड़की खोलकर पानी की बोतल बाहर उछाल देते हैं। क्यों? क्योंकि सड़क मेरी नहीं है। सड़क की सफाई से मेरा "मोक्ष" नहीं जुड़ा है।
यह कैसी विडंबना है कि जिस संस्कृति में "शुचिता" और "पवित्रता" पर इतना जोर दिया जाता है, उसी संस्कृति के सार्वजनिक स्थल दुनिया में सबसे गंदे हैं? आप किसी भी गुरुद्वारे, चर्च या मस्जिद में चले जाइए, वहां आपको एक अलग स्तर की सफाई मिलेगी। लेकिन हमारे मंदिरों के आस-पास? वहां गंदगी का अंबार लगा होता है। यह इसलिए नहीं कि हम सफाई करना नहीं जानते, बल्कि इसलिए कि हमारी सफाई सिर्फ "स्व" तक सीमित है।
गंगा माँ या कचरा पेटी?
हम गंगा को माँ कहते हैं। हम कहते हैं कि गंगा में डुबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि हम उस माँ के साथ क्या कर रहे हैं?
हम अपने पाप धोने के लिए गंगा में जाते हैं और बदले में गंगा को अपना कचरा, मैल और गंदगी दे आते हैं। "मुझे मेरा मोक्ष मिल जाए, उसके लिए माँ मैली होती है तो होती रहे।" यह है हमारी मानसिकता। दुनिया के किसी भी देश में नदियाँ इतनी प्रदूषित नहीं मिलेंगी जितनी भारत में हैं, और मजे की बात यह है कि दुनिया के किसी भी देश में नदियों को "माँ" नहीं कहा जाता।
यह पाखंड की पराकाष्ठा है। हम अपने "व्यक्तिगत उद्धार" के लिए सार्वजनिक संपत्ति का विनाश कर रहे हैं। क्या यह धर्म है? या यह स्वार्थ का नंगा नाच है?
पहाड़ों का दर्द और देवताओं की भूमि
हमने हिमालय को "देवभूमि" कहा। हमने पर्वतों को पूजनीय माना। लेकिन आज हमारे पहाड़ों की हालत देखिए। पर्यटकों की भीड़, प्लास्टिक की बोतलें, चिप्स के पैकेट और शराब की बोतलें। हमने देवभूमि को कचरा-भूमि बना दिया है।
यह सब "लोकधर्म" का नतीजा है। लोकधर्म मतलब स्वार्थ के लिए धर्म। "मैं पहाड़ पर जा रहा हूं पुण्य कमाने, दर्शन करने। वहां मैं क्या गंदगी फैलाता हूं, उससे मुझे क्या फर्क पड़ता है?"
गाय: माँ या मशीन?
गाय पर राजनीति और हिंसा तो खूब होती है, लेकिन गाय की असली हालत क्या है? हम गाय को माँ कहते हैं, लेकिन दुनिया में बीफ़ निर्यात में भारत अव्वल है। यह बीफ़ कहां से आता है? उन्हीं गायों और उनके बछड़ों से जिन्हें हमने दूध न देने पर सड़कों पर छोड़ दिया या कत्लखानों में बेच दिया।
ज्यादातर दुधारू पशु आज कृत्रिम गर्भाधान (Artificial Insemination) से पैदा किए जाते हैं। उन्हें मशीनों की तरह पैदा किया जाता है ताकि हम उनका दूध पी सकें। और जब हम कहते हैं, "अगर हम दूध नहीं पिएंगे तो इनका क्या होगा?" तो कड़वा सच यह है कि अगर आप दूध नहीं पिएंगे, तो उन्हें जबरदस्ती पैदा ही नहीं किया जाएगा। वे प्राकृतिक नहीं हैं, वे हमारे भोग के लिए फैक्ट्रियों में तैयार किए गए उत्पाद हैं।
लेकिन हमें क्या? हमें तो दूध चाहिए, दही चाहिए, घी चाहिए। गाय के साथ क्या हो रहा है, वह किस दर्द से गुजर रही है, उससे हमें कोई सरोकार नहीं।
धर्म: आईना या मुखौटा?
असली धर्म क्या है? क्या सिर्फ माला जपना और मंदिर में माथा टेकना धर्म है?
वास्तविक धर्म का मतलब है संवेदनशीलता।
जब तक आप दूसरे की पीड़ा को महसूस नहीं कर सकते, आप धार्मिक हो ही नहीं सकते। जो सिर्फ अपनी मुक्ति के बारे में सोच रहा है, उससे बड़ा अधर्मी कोई नहीं है। अगर मुझे स्वर्ग मिल रहा हो, लेकिन मेरे सामने कोई तड़प रहा हो, तो उस स्वर्ग को ठुकरा देना ही असली धर्म है।
धर्म कहता है: "तुझे साफ़ करने की ख़ातिर मुझे ख़ुद मैला होना स्वीकार है।"
यह है असली आध्यात्म। लेकिन हमने धर्म को क्या बना दिया? "मैं साफ़ रहूं, तू गंदा रहे।"
रेलवे की वह घटना याद आती है जहां एक माँ ने अपने बच्चे की गंदगी उसी चादर से साफ़ कर दी जो रेलवे ने ओढ़ने के लिए दी थी। क्यों? क्योंकि "यह मेरी चादर थोड़ी है, यह तो रेलवे की है।" यह मानसिकता हमारे देश को खा रही है। हम देशभक्ति के नारे लगाते हैं, लेकिन सरकारी संपत्ति को अपनी जागीर समझकर गंदा करते हैं। पान की पीक से रंगी सरकारी दफ्तरों की सीढ़ियां हमारी "देशभक्ति" का सबूत हैं।
खुले में शौच और हमारी 'मर्दानगी'
सरकार ने 'स्वच्छ भारत अभियान' चलाया, शौचालय बनवाए। लेकिन मानसिकता कैसे बदलें? हाईवे के ढाबों पर शौचालय होने के बावजूद लोग खुले में पेशाब करना पसंद करते हैं। क्यों? क्योंकि "जब तक खुली हवा न लगे, मज़ा नहीं आता।"
यह सिर्फ गंदगी फैलाने की बात नहीं है, यह एक गहरी मानसिक बीमारी है। यह अहंकार है जो कहता है, "मैं कुछ भी कर सकता हूं। मुझे किसी नियम की परवाह नहीं। मुझे अपनी सुविधा चाहिए, चाहे उससे दूसरों को कितनी भी परेशानी क्यों न हो।"
हम महिलाओं पर पर्दा करने का दबाव डालते हैं, लेकिन खुद सरेआम अपनी 'मर्दानगी' का प्रदर्शन करते फिरते हैं। यह बेशर्मी हमारे समाज के नैतिक पतन का सबूत है।
काशी: मोक्ष या मलीनता?
वाराणसी, दुनिया का सबसे पुराना शहर, भोले बाबा की नगरी। वहां जाकर देखिए। संकरी गलियां, गोबर, कीचड़ और बहता हुआ गंदा पानी। लोग कहते हैं, "काशी में मरने से मुक्ति मिलती है।"
अरे भाई! कैसी मुक्ति? किस बात की मुक्ति?
क्या उस शहर को गंदा करके मुक्ति मिलेगी जिसे आप पवित्र मानते हैं? असली मुक्ति तब है जब आप काशी जाएं, लेकिन मरने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए और सफाई करने के लिए। जब आप अपनी "व्यक्तिगत मुक्ति" का लोभ छोड़कर "सार्वजनिक हित" के लिए झाड़ू उठा लें, तब शायद आपको असली मोक्ष मिले।
क्योंकि मुक्ति का मतलब ही है अहंकार से मुक्ति। और "मुझे मोक्ष चाहिए" यह सबसे बड़ा अहंकार है।
निष्कर्ष: जाके पाँव न फटे बिवाई...
धर्म का मतलब है अपने अंदर झांकना। धर्म आईना है, नशा नहीं। जो धर्म आपको बेहोश कर दे, वह अफीम है। जो धर्म आपको जगा दे, वही अमृत है।
हमें अपने दुख का एहसास नहीं है, इसलिए हम दूसरों को दुख देते हैं। जिस दिन हमें अपनी गंदगी, अपने मानसिक कचरे का अहसास हो जाएगा, उस दिन हम बाहर कचरा फैलाना बंद कर देंगे।
भारत को आज मंदिरों की नहीं, विवेक की जरूरत है। भारत को आज पुजारियों की नहीं, सफाईकर्मियों की जरूरत है—वे सफाईकर्मी जो सिर्फ सड़कों को नहीं, बल्कि हमारे दिमागों को भी साफ़ कर सकें।
तो अगली बार जब आप मंदिर जाएं, तो प्रसाद चढ़ाने से पहले सड़क पर पड़ा एक रैपर उठा लीजिएगा। शायद भगवान उस प्रसाद से ज्यादा खुश होंगे।
यह लेख आत्म-चिंतन और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि हमें एक बेहतर और जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करना है।